अभी विश्व कोरोनाकाल के समय हुई आर्थिक हानि से उबरने की कोशिश में लगा हुआ था। तभी फरवरी में रूस का यूक्रेन पर की गई सैन्य कार्रवाई में पूरे विश्व की चिंता बढ़ा दी है। कई देशों ने इसका सीधे शब्दों में विरोध किया है।

इसके अलावा भी कई कंपनियों और एजेंसियों में रूस में अपनी सेवाएं बंद करके रूस को मजबूर करने की पूरी कोशिश की। लेकिन ये युद्ध अभी भी लगातार चल रही है। इसका सबसे बड़ा असर विश्व की अर्थव्यवस्था पर देखा जा रहा है।

तेल के बढ़ते दाम, गिरते स्टॉक मार्केट से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि युद्ध पर विराम नहीं लगा तो भविष्य में संकट बढ़ने वाला है। इस लेख में हम आपको बताएंगे की इस युद्ध का विश्व की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ा है।

ईंधन के दाम बढ़े

 सबसे बड़ा असर कच्चे तेल पर देखा जा सकता है। तेल की कीमतें लगातार बढ़ती जा रही है। 2014 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के दाम को पर कर गया है।

इसके सिवा कई यूरोपीय देश रूसी ऊर्जा पर बहुत अधिक निर्भर हैं। इसमें विशेष रूप से कई महत्वपूर्ण पाइपलाइनों के माध्यम से गैस की आपूर्ति की बात की जाए तो। यहां तक की अगर संघर्ष समाप्त ​​हो जाता है, तो संभावना है कि रूस पर कठोर आर्थिक प्रतिबंध इन देशों के लिए गैस आयात करने में सक्षम होने के लिए बहुत मुश्किल बना देंगे।

इस बीच, पिछले हफ्ते फिर से तेल की कीमतों में वृद्धि हुई क्योंकि रूसी बैंकों पर प्रतिबंधों के बाद आपूर्ति में बाधा उत्पन्न हुई। लेख लिखे जाने तक तेल की कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल है। आपको बताते चलें कि रूस एक दिन में 6.5 मिलियन बैरल कच्चे तेल का निर्यात करता है। इसके अलावा इसकी प्राकृतिक गैस उत्पादन में हिस्सेदारी 17% की है। 

यातायात हुआ प्रभावित

इस युद्ध में यातायात की ओर भी समस्याएं पैदा होने की संभावना है। इसमें मुख्य रूप से समुद्री शिपिंग और रेल भाड़ा शामिल हैं। एशिया और यूरोप के बीच कुल माल ढुलाई पर इसका असर होने वाला है। यूरोप के कई देश व्यापार के लिए समुद्री जहाजों और रेल नेटवर्क का प्रयोग करते है। लेकिन युद्ध इसमें प्रभाव डालेगा, जब रेल और जहाजों के ढुलाई भाड़े में इजाफा होगा। लिथुआनिया जैसे देश रूस के खिलाफ प्रतिबंधों से अपने रेल यातायात को बुरी तरह प्रभावित होने की उम्मीद कर रहे हैं।

सप्लाई चैन में असर

महामारी के बाद से कंपनियां कस्टमर की मांग के हिसाब से उत्पादन करने की ओर कार्य कर रही थी। लेकिन युद्ध ने इसपर बुरा असर डाला है। तेल की कीमतों में इजाफा, कम उत्पादन, दाम में बढ़ोतरी, और माल के एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने में देरी, आदि कुछ कारक है जो बाधा उत्पन्न कर रही हैं।

खाने योग्य तेल और अन्य सामग्री की कमी

 आपको बताते चलें कि अकेले यूक्रेन सूरजमुखी तेल के निर्यात का लगभग आधा हिस्सा बनाता है। अगर ऐसे ही युद्ध चलता रहा तो उत्पादन में समस्या आएगी। जिसका असर निर्यात पर पड़ेगा। 

भारत की कच्चे खाद्य तेल की 70 प्रतिशत से अधिक मांग आयात के माध्यम से पूरी की जाती है। यूक्रेन और रूस दुनिया के गेहूं के निर्यात का 30 प्रतिशत, मक्के का 19 प्रतिशत और सूरजमुखी के तेल का 80 प्रतिशत हिस्सा है। इस खाद्य पदार्थों का निर्यात कई छोटे और गरीब देशों में किया जाता है।

ऑटो सेक्टर का बुरा हाल

 इस युद्ध से ऑटोमोबाइल सेक्टर को भारी नुकसान होने की आशंका है। कोरोनावायरस के बाद वैसे ही सेमीकंडक्टर्स और चिप्स की कमी चल रही थी। अब युद्ध के बाद संकट में और इजाफा होने की संभावना है। इसके अलावा, यूक्रेन में कई कंपनियों का परमानेंट कारखाना है जो वाहन निर्माताओं के लिए कार घटकों का निर्माण करती हैं।

इसके अलावा भी स्टॉक के दाम गिर रहे है, बेरोजगारी और भुखमरी में इजाफा होने की संभावना है। SWIFT द्वारा संचालन बंद करने पर विदेशी मुद्रा निवेश के साथ साथ रूस का दूसरे देशों से व्यापार भी प्रभावित हुआ है।

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